क्या आप जानना चाहते हैं कि इस्लामिक त्योहार क्यों बदलते हैं और कैसे मनाए जाते हैं? यहाँ सीधी और काम की जानकारी मिलेगी — तारीखें क्यों बदलती हैं, प्रमुख उत्सव क्या हैं और किसी समुदाय में शामिल होने के लिए क्या व्यवहार अपनाएँ।
रमज़ान: यह माह रोज़े रखने का महीना है। सेहरी से लेकर इफ्तारी तक मुसलमान रोज़ा रखते हैं, ज्यादा तर हाथ-दवा, खाना-पीना और बद बोलने से परहेज़ किया जाता है। महीने का अंत ईद-उल-फ़ितर से होता है — यह खुशियाँ और दान का दिन है।
ईद-उल-फ़ितर: रोज़ों के बाद की ईद है। सुबह जामा अता होती है, नमाज़ के बाद लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। गरीबों के लिए ज़कात-उल-फ़ितर देने की प्रथा रहती है।
ईद-उल-अधा: यह कुर्बानी का त्योहार है। हज के साथ जुड़ा हुआ यह दिन इब्राहीम की कुर्बानी की याद दिलाता है। कई जगह जानवरों की कुर्बानी की जाती है और मांस का बड़ा हिस्सा जरूरतमंदों को दिया जाता है।
अश्रु/मुहर्रम: मुहर्रम का महीना शोक और आत्म-पर्व का समय होता है, खासकर शियाओं में। पहले दिन से दसवें दिन (आशुरा) तक खास आयोजन होते हैं।
मौलूद/मिलद-उन-नबी: पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन को मनाने वाले कार्यक्रम होते हैं — मस्जिदों और समुदायों में नक्काशी, नाश्ता और सरल भजन सुनने की प्रथा होती है।
त्योहार चाँद के कैलेंडर पर चलते हैं, इसलिए तारीखें हर साल लगभग 10-11 दिन पहले आ जाती हैं। नया महीना चाँद देखने पर घोषित होता है, इसलिए आधिकारिक घोषणा का इंतज़ार करें।
यदि आप किसी मुस्लिम परिवार के साथ त्योहार मनाने जाएँ तो नमाज़ के बाद मिलने, हाथ मिलाने और सलाम करने का तरीका अपनाएँ। महिलाओं को घर के नियम और पहनावे का सम्मान करना चाहिए। उपहार और मिठाई लेकर जाना अच्छा माना जाता है।
दान देना (ज़कात और मुफ़्तान) इन त्योहारों का अहम हिस्सा है। अगर आप मदद करना चाहते हैं तो स्थानीय मदरसों, राहत संगठनों या सीधे जरूरतमंदों को खाद्य पैकेट और पैसे दे सकते हैं।
इफ्तार कार्यक्रमों में शामिल होने से पहले पूछ लें कि खाना शाकाहारी है या नहीं, और अगर आप घुसने से पहले उपयुक्त समय जानना चाहें तो आयोजकों से संपर्क करें।
सुरक्षा और सार्वजनिक आयोजनों में संयम रखें। बड़ी भीड़ वाले ईवेंट में अपने बच्चों का ध्यान रखें और जरूरी दस्तावेज साथ रखें।
अगर आप त्योहारों की तिथियाँ जानना चाहते हैं तो स्थानीय मुस्लिम समुदाय, मशवरा क्लर्क या इस्लामी केंद्र की आधिकारिक खबरों पर भरोसा करें — सोशल मीडिया की अफवाहें अक्सर गलत होती हैं।
ये छोटी-छोटी बातें आपको इस्लामिक त्योहारों को समझने और सम्मानपूर्वक हिस्सा लेने में मदद करेंगी। किसी कार्यक्रम में जाएँ तो खुलकर पूछें, सीखें और अपने व्यवहार से समुदाय का सम्मान बढ़ाएँ।
ईद-उल-अजहा, जिसे बकरीद भी कहा जाता है, इस्लामी कैलेंडर का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। 2024 में यह रविवार, 16 जून को सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर और अन्य पश्चिमी देशों में मनाया जाएगा, जबकि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में यह एक दिन बाद, 17 जून को मनाया जाएगा। इस त्योहार को पैगंबर इब्राहिम की परंपरा से जोड़ा जाता है और इसमें कुर्बानी दी जाती है।