पैसे का नियंत्रण सिर्फ अकाउंट-बैलेंस देखने तक सीमित नहीं है। सही वित्तीय नियंत्रण का मतलब है—खर्चों को समझना, बचत को बढ़ाना, कर्ज को नियंत्रित रखना और खबरों से मौके पहचानना। क्या आपने कभी बाजार की खबर पढ़ कर बिना सोच-समझे निवेश किया और पछताया? यहां आसान और काम आने वाले तरीके हैं जो रोज़मर्रा में तुरंत लागू किए जा सकते हैं।
सबसे पहले महीने का बजट बनाइए। आम तौर पर 50/30/20 नियम काम आता है — 50% जरूरी खर्च, 30% इच्छाएँ और 20% बचत या निवेश। यह नियम सख्ती से ना लें; अपने लक्ष्य और आय के हिसाब से समायोजित करें।
दूसरा, आपातकालीन फंड बनाएँ। 3-6 महीनों के खर्च जितना अलग रखें ताकि नौकरी छूटने या मेडिकल इमरजेंसी में परेशानी न हो। यह फंड बैंक की बचत या लिक्विड फंड में रखें, जहाँ जरूरत पर पैसे जल्दी मिल जाएँ।
तीसरा, उच्च ब्याज वाले कर्ज (क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन) को तेज़ी से चुकाएँ। छोटे-छोटे EMIs सौभाग्य नहीं हैं—ये आपकी बचत खा सकते हैं। पहले अधिक ब्याज वाले कर्ज का भुगतान करें और फिर अन्य कर्ज घटाएँ।
चौथा, निवेश को अलग तरह से सोचिए—इमरजेंसी फंड और पीयर-टू-पीयर बचत अलग, लक्ष्य-आधारित निवेश अलग। SIP से लंबी अवधि के लिए इक्विटी एक्सपोज़र लें, और शॉर्ट टर्म के लिए बैंक फिक्स्ड डिपॉज़िट या डेब्ट फंड ठीक रहते हैं।
समाचार पढ़ना अच्छा है, पर हर खबर पर कार्रवाई मत कीजिए। उदाहरण के लिए हमारे साइट पर "Trent, CDSL और PNB के शेयरों में हलचल" जैसी रिपोर्ट पढ़कर आप कंपनी के बुनियादी कारण समझ सकते हैं—क्या यह अस्थायी है या दीर्घकालिक? इसी तरह "डीएएम कैपिटल एडवाइजर्स आईपीओ" जैसी खबरें IPO के डेटा देखने का मौका देती हैं—प्राइसिंग, सब्सक्रिप्शन और लिस्टिंग पर नजर डालें।
बाजार बंद रहने की सूचनाएँ (जैसे "शेयर बाजार तीन दिन रहेगा बंद") या अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ ("पाकिस्तानी शेयर बाजार में गिरावट") आपके ट्रेडिंग शिड्यूल और जोखिम सहनशीलता को प्रभावित कर सकती हैं। खबर पढ़ें पर निर्णय डेटा और अपने वित्तीय लक्ष्य के आधार पर लें।
अंत में, नियमित रिव्यु जरूरी है। हर तीन महीने में अपना बजट, निवेश और ऋण संरचना देखें। छोटे-छोटे अपडेट—टैक्स-बचत योजनाएँ, नए प्रोडक्ट्स जैसे इलेक्ट्रिक वाहन सब्सिडी, या बैंकिंग नीतियाँ—आपके वित्तीय नियंत्रण को बेहतर बना सकती हैं।
वित्तीय नियंत्रण कोई जादू नहीं है—नियम, अनुशासन और सही जानकारी चाहिए। शुरुआत छोटी करें: आज अपने महीने के खर्चों की सूची बना लें, और एक आपातकालीन फंड की शुरुआत कीजिए। धीरे-धीरे ये छोटे कदम बड़े वित्तीय आराम में बदल जाते हैं।
राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तीसरे कार्यकाल में बड़े बदलावों का अनुमान लगाया है। इन बदलावों में पेट्रोलियम को जीएसटी के दायरे में लाना और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर अंकुश लगाना शामिल हो सकता है। किशोर के अनुसार, केंद्र सरकार राज्यों को संसाधन हस्तांतरित करने में देरी कर सकती है और वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन (FRBM) मानदंडों को सख्त कर सकती है।